प्रेम... ये तूने क्या....




प्रेम... ये तूने क्या खिलाई गोली
ना सोऊँ ना कभी आँखें खोली 

 
क्या बाळक जैसे रूप दिखाता

अपने पागलपन पर इतराता 

हँसा रूलाकर सता धताकर

जाने तू क्या है पा जाता

जीवन क्या बस उसके रंग है

जीवन क्या बस उसका संग है

जीवन क्या बस उसके तेवर

बस उसकी बोली हँसी-ठिठोली

प्रेम... ये तूने क्या खिलाई गोली
ना सोऊँ ना कभी आँखें खोली 

 
था गर्व मुझे ज्यूँ होता खुद को

हर वजह पता थी, क्या खोता सुध​-बुध को

अब तू जब तब मेरी काल-कोठरी में घुस जाए (प्रकाश गति  से)

जो भनक पड़े तो रोकूँ तुझ को

कचरे, धुँऐ, भँवर, सोते, झरने फट फूट के निकले

पहाड़ बर्फ़ के, लोहे पत्थर के पिघले

जब  मेरे अंदर, ...अंदर घुसकर तूने 

कैसी कैसी गाँठे खोली

प्रेम... ये तूने क्या खिलाई गोली
ना सोऊँ ना कभी आँखें खोली 

 
पहले किस रंग की थी ये दुनिया? 

शायद, राह का संग थी ये दुनिया

अब कभी इन्द्र्धनुष कभी बदरा छाएँ

और ये चाँद सितारे कहाँ से आए

परिंदे, बारिश,​ नदी, वादियाँ, पुरवाई

क्या क्या तान सुनाएँ राग सुनाएँ

करूँ क्या करूँ जो न करूँ इसे सिजदा

जब ये दुनिया सारी उसमें हो ली


प्रेम... ये तूने क्या खिलाई गोली
ना सोऊँ ना कभी आँखें खोली 

 
                                --- ऐ..... जस