उसने मानो मुझसे पूछा…

चल खाता संग गुलाटी क्या
बैसाखी क्या और लाठी क्या
रूप रंग कद काठी क्या
चल खाता संग गुलाटी क्या


कैसी सोच जो पंगुता देखे
सोच बनी है नाटी क्या
कर्मों के इस जोड़ तोड़ में
कुछ दया-वया ही छाँटी क्या


परिंदों जैसे कुछ कमियाँ हममें
पेड़ पौधों जैसे कुछ जड़ता है
न उजाड़ किया न ख़ून ख़राबा
धरती हमने कभी बाँटी क्या


तू चूर रहा तू पूरा है
क्या पूरा ही बड़ा अधूरा क्या
तू भी कुछ हल्का हो जाता
जो रखता हमको सहपाठी क्या


तेरी आँखों में कुछ मेरी नज़र​ 
कुछ पैर तेरे चलें चाल मेरी
लौटा कर रंग इस दुनियाँ के
चल करें नई परिपाटी क्या

 

                               ---ए... जस​