बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा
                    


                        बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा
                        बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा       

 
अपना ही जल गंदा किया
गंदी किये अपनी हवा
अपनी मिट्टी में ज़हर भरा
हमने मानकर उसको दवा

                       बिगड़ी हवा  बिगड़ी हवा

 प्रलय करे अम्लीय घटा
 भीषण चले बिगड़ी हवा
 कहीं धरती बिन आँसू रोती है 
 हमको नहीं आती दया

                       बिगड़ी हवा  बिगड़ी हवा

बस आकड़ों का ही शोर है
बस बिज़नैस का ही दौर है
बस बातें  जॅाब की होती हैं
और अपने रोब का है नशा

                      बिगड़ी हवा   बिगड़ी हवा

जब चाहेंगे संभल लेंगे
जब चाहेंगे बदल देँगे
अभी बस​ ‘और ज़्यादा की’ होड़ करें
कभी होगा इक आविष्कार नया

                       बिगड़ी हवा  बिगड़ी हवा

इक गँगा साफ़ न कर पाये
सागरों को साफ करेंगे  क्या
न​ई हवा कहाँ से लायेंगे
न​ई मिट्टी हम​ भरेंगे क्या

                      बिगड़ी हवा   बिगड़ी हवा

पृथ्वी बस इतनी ही है
ये अपने घर जितनी ही है
जो भर देंगे कचरे से इंसानों से
फिर इसमें हम​ रहेंगे क्या

                        बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा

अब धरती नहीं, फायदा है माँ
हवा पानी जंगल सब रोकड़ा
सब नशा-नशा धुआँ-धुआँ
अस्तित्व मिटा मानेंगे क्या

अस्तित्व मिटा मानेंगे क्या
सर्वनाश पर मानेंगे क्या

हो धुआँ फ़ना मानेंगे क्या
मिटा नामो- निशां मानेंगे क्या

                        बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा
                        बिगड़ी हवा बिगड़ी हवा

 

                                --- ऐ..... जस​