जंगल के पौधों में...... 



जंगल के पौधों में --- सब जंगल की बातें थीं

सिकुड़ने, झग​ड़ने, बिगाड़ने लगे क्यारियों में पाले जाने के बाद​

 
इस क़दर सिखा डालो कि सोचें सब किताबों मशीनों की तरह​

रोबोट किन्हें चलाएंगे वरना  इंसाँ बन जाने के बाद​

 
उनकी समझाने की ज़िद ने बच्चे को बहरा सा कर दिया

अब कौन सुन सकता है इस क़दर समझाने के बाद​

 

मैं कोई क्यूट सा पिल्ला भी नहीं कि बाँध कर घर पर रखा जा सकूँ

अब​  वो भी क्या करते थे मेरा, उनके काम आने के बाद

 
हद-ए-तदबीर​, फ़िक्र-ए-सेहत​, अब अचानक मिठाईयाँ नहीं बंटती

अम्मा समझी थी ल​ड्डू मिलेंगे बहू का जी मिचलाने के बाद​

 
जहाँ भी बैठे वो अपनी अक़्लमंदी, दरियादिली, मेहरबानियाँ बयान करते हैं

वो भी क्या करते जब मैं ही समझता, सरेआम  मार खाने के बाद


मेरी रुह-ए-तिफ़्ल-ए-ज़िंदगी को मैंने, जब  यूँ घूरते देखा अपने क़ातिलों को

मैं न रोया, न हँसा, न कुछ कह ही सका, ख़्वाब में उनके पछताने के बाद

                                                                  

​                                                                         ---- ऐ..... जस​